वेदारम्भ संस्कार
वेद-अध्ययन के शुभारम्भ का पवित्र संस्कार
वेदारम्भ संस्कार गुरुकुल शिक्षा का सबसे पवित्र और भावपूर्ण क्षण है। यह वह संस्कार है जिसमें बालिका को औपचारिक रूप से वेद-अध्ययन में दीक्षित किया जाता है — गुरु के सान्निध्य में, यज्ञाग्नि के समक्ष।
प्राचीन भारतीय परम्परा में वेदारम्भ (उपनयन) संस्कार जीवन के सोलह संस्कारों में से एक है। इसे "द्वितीय जन्म" माना जाता है — क्योंकि इसके पश्चात् बालिका ज्ञान के एक नये संसार में प्रवेश करती है। महर्षि दयानन्द ने स्पष्ट किया कि यह संस्कार बालक और बालिका — दोनों के लिए समान रूप से विधान है।
संस्कार विधि
- पूर्व तैयारीबालिका को संस्कार के अर्थ और महत्व की जानकारी दी जाती है।
- यज्ञ-कुण्ड की स्थापनावेदी का निर्माण, समिधा और हवन सामग्री की व्यवस्था।
- गायत्री मन्त्र उपदेशगुरु द्वारा बालिका को गायत्री मन्त्र का उपदेश — यह संस्कार का मुख्य अंग है।
- यज्ञोपवीत धारणपवित्र सूत्र का धारण, जो ज्ञान-साधना के संकल्प का प्रतीक है।
- आहुतियाँयज्ञाग्नि में आहुतियाँ, वेद-मन्त्रों का उच्चारण।
- गुरु-आशीर्वादगुरु और उपस्थित विद्वानों द्वारा आशीर्वाद।
वेदारम्भ के पश्चात् बालिका नियमित रूप से प्रातः और सायं सन्ध्या-उपासना करती है, गायत्री मन्त्र का जप करती है, और वेद-अध्ययन का क्रम आरम्भ होता है।
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ओ३म् भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम्...
गायत्री मन्त्र — वह प्रकाश जो बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करता है।